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संविधान दिवस पर विशेष- चुनाव-सुधार के माध्यम से स्वच्छ राजनीती की स्थापना। प्रताप चन्द्र राष्ट्रवादी

संविधान का सबसे बड़ा मजाक तो ये है कि चुनाव वही लड़ेगा जिसका वोटर लिस्ट में नाम होगा, और किसी पार्टी का नाम वोटर लिस्ट में नही है फिर भी पार्टियों को चुनाव चिन्ह दिया जाता है और चुनाव लड़ती हैं, जबकि पार्टियों की भूमिका कोचिंग की तरह अच्छे नेता तैयार करने की है….पार्टियों का चुनाव चिन्ह सबसे महंगा बिकाऊ चीज बन गई है चुनाव चिन्ह राष्ट्रीय रोग है।

देश में गड़बड़ी की सबसे बड़ी वजह जवाबदेही है क्यूंकि लोक-तंत्र का सीधा सम्बन्ध है जवाबदेही से। लोकतंत्र कि परिभाषा है “जनता अपनें प्रतिनिधि के माध्यम से सत्ता पर नियंत्रण रखेगी” परन्तु पार्टियों के गिरोह बन जानें से बन गई इलेक्टेड मोनार्की

संविधान के 19-ABC के अनुसार समूह, संस्था, यूनियन, कोआपरेटिव, सोसाइटी बनानें का अधिकार है, इसी के तहत पार्टियाँ (समूह) बनीं जिसे चुनाव आयोग नें 1989 में RP Act-29 तहत पार्टियों का पंजीकरण किया ताकि पार्टियाँ अपनी विचारधारा का प्रचार कर सकें और अपनी विचारधारा का प्रतिनिधि विकल्प दे सकें, परन्तु चुनाव आयोग द्वारा पार्टियों के लिए किये आरक्षित चुनाव-चिन्ह को पार्टियों नें अपना पहचान-चिन्ह बनाकर ब्रांड प्रोडक्ट के रूप कमल, पंजा, साइकिल, हाथी, झाड़ू, लालटेन आदि स्थापित कर चुनाव-चिन्ह की नीलामी करनें लगे और प्रतिनिधि उस स्टेब्लिश चुनाव-चिन्ह के प्रति जवाबदेह बन गया बजाये जनता के प्रति जवाबदेह होनें के चुनाव-चिन्ह की लोकतंत्र में भूमिका : EVM पर चिन्ह (आकृति) केवल अशिक्षित मतदाताओं के लिए लगाया जाता है चूँकि वो नाम नहीं पढ़ पाते है लिहाज़ा चिन्ह (आकृति) देखकर अपने प्रत्याशी को वोट दे पाते हैं, अब EVM पर प्रत्याशी की फोटो (आकृति) लगने लगी है जिसने चुनाव चिन्ह की भूमिका को समाप्त कर दिया | अब अशिक्षित लोग फोटो पहचान कर मतदान कर सकेंगे लिहाज़ा EVM पर दो-दो चिन्ह को रखना न सिर्फ बेमानी है बल्कि अवसर की समता का उलंघन भी है।

चुनाव लडनें की योग्यता संविधान के अनुच्छेद 84 में दी गयी है जिसके अनुसार चुनाव वहीलड़ेगा जो भारत का नागरिक हो, वोटर हो और बालिग भी हो लिहाज़ा साफ़ हो जाता है कि कोई दल, निकाय इन योग्यताओं को पूरा नहीं कर सकती इसीलिए कभी भी दलों का नाम EVM पर नहीं छपता है फिर भी चुनाव-चिन्ह की वजह से ही तय होता है कि किस चिन्ह वाले की सत्ता है और उस चिन्ह के समर्थक भौकाल झाड़ते हैं |लोकतंत्र की आज़ादी का उपाय : सिर्फ एक उपाय ये है कि EVM से चुनाव-चिन्ह हटाया जाये, क्यूंकि इसके हटते ही चुनाव-चिन्ह की जगह चेहरे (फोटो) का प्रचार और पहचान कराना अनिवार्य हो जायेगा, चुनाव लड़ने वाला आपके बीच रहकर काम करनें के लिए बाध्य होगा जिससे प्रतिनिधि पार्टी के बजाये जनता का रहेगा और जन साधारण भी आसानी से सत्ता के शिखर पर बगैर पार्टी की कृपा के पहुच सकेगा जबकि आज जमीन से जुड़े कार्यकर्ता पार्टी की अनुकम्पा के मोहताज़ हैं जिनकी उपेक्षा करके पार्टियाँ बाहर के लोगों को टिकट नीलाम कर देती हैं चुनाव-चिन्ह (आकृति) के EVM से हटते ही जनता द्वारा संवैधानिक सरकार बनेगी एवं जनहित में काम होगा और लोकतंत्र आज़ाद हो जायेगा

उद्देश्य : चुनाव-सुधार के माध्यम से स्वच्छ राजनीती की स्थापना।

विजन और एफोर्डएबल तरीका लोकतंत्र को आज़ाद करानें और Clean Politics के लिए पार्टियों के सामनें जो खामियां हैं उसे दूर करके एक आदर्श पार्टी का माडल देना होगा जिससे स्थापित पार्टियों को आदर्श माडल की तरह कार्य करनें की बाध्यता हो जाये। उक्त बातों की मांग होती रही है पर पार्टियाँ सुनने के बजाये ये बताती हैं कि पार्टी नहीं है इसलिए चिल्ला रहे हैं, इसलिए कोई एक आदर्श पार्टी अगर उक्त बातें खुद लागू करके अन्य पार्टियों से मांग करेगी तो उन्हें भी विवश होना पड़ेगा लागू करनें को, दूसरी बात ये है कि हाल के वर्षों में सरकारों द्वारा उनके विरुद्ध आवाज़ उठाने पर सामाजिक कार्यकर्ताओं को प्रताड़ित करके फर्जी मुकदमें कराकर जेल तक भेज रही हैं, एक तो वैसे ही जनहित में काम करनें वाले मुट्ठी भर हैं ऐसे में अगर उन्हें बचाव का भी रास्ता है पार्टी में क्यूंकि सरकारें पार्टियों पे हाथ डालनें में संकोच करती हैं और अगर कुछ करती भी हैं तो एक साथ विरोध करनें वाले खड़े हो सकेंगे इसलिए अब ये जरुरी है कि अच्छे सोच के लोग भी संगठित होकर जनहित में संघर्ष करें वर्ना कोई बचेगा ही नहीं। तीसरा ये कि स्थापित व्यवस्था के तहत ही अपनी बात कही जा सकती है। चुनाव आचार संहिता लगनें के बाद कोई व्यक्ति बिना अनुमति के प्रचार नहीं कर सकता है और अनुमति मिलेगी सिर्फ प्रत्याशी को इसलिए मध्य प्रदेश में NOTA का प्रचार करनें हेतु श्री विष्णु कान्त शर्मा को प्रत्याशी बनकर प्रचार करना पड़ा, परिणामस्वरूप सत्ताधारी पार्टी को सत्ता से बाहर होना पड़ा…ये एक माडल था जो आगे बहुत प्रभावी होगा।

आदर्श पार्टी का उदाहरण :

1- EVM मशीन पर लगी प्रत्याशी की फोटो ही उसका चुनाव-चिन्ह होगा जिससे जनता के प्रति जवाबदेह रहे न कि पार्टी के प्रति।

2- पार्टी व्हिप जारी नहीं करेगी जिससे कि जनता का जिताया प्रतिनिधि पार्टी का गुलाम न बन सके और जनहित में काम करे।

3- जनप्रतिनिधि चुने जाने के बाद सिर्फ १ पेंशन का ही हक़दार होगा (अभी जितनी बार प्रतिनिधि बनता है उतनें पेंशन पाता है)

4- प्रतिनिधि का चुनाव के समय घोषित संपत्ति एक जायज अनुपात से अधिक बढती है तो उसे राष्ट्र कि संपत्ति घोषित कर दी जाये

5- चुने जाने के बाद जनप्रतिनिधि पार्टी का पधाधिकारी नहीं रहेगा और पार्टी हेतु प्रचार नहीं करेगा जिससे सिर्फ जनसेवक ही रहे और जनहित में काम करे।

1- प्रश्न : सभी ये ही कहकर पार्टी बनाते हैं कि बदलाव और व्यवस्था परिवर्तन करेंगे पर कर पाते हैं तो सत्ता परिवर्तन ?

उत्तर : व्यस्था कहनें से नहीं बदल सकती बल्कि करना होता है, ये दावे से कहा जा सकता है कि जिन वजहों से लोकतंत्र पार्टियों का बंधक हो गया उसे आज तक किसी भी पार्टी नें ख़त्म करनें हेतु करना तो दूर कभी सोची भी नहीं।

2- प्रश्न : किस वजह से लोकतंत्र पार्टियों का बंधक हो गया ?

उत्तर : वैसे तो कई कारण हैं पर मूलतः २ कारण है, पहला लोकतंत्र में जनता अपने प्रतिनिधि के माध्यम से सत्ता पे नियंत्रण रखती है परन्तु पार्टियों को चुनाव-चिन्ह आरक्षित हो जानें के कारण प्रतिनिधि जीतने के बाद जनता के बजाये पार्टी के नियंत्रण में हो जाता है क्यूंकि वो EVM पे पार्टी के चुनाव-चिन्ह होनें से ही जीता होता है और आगे भी उसी चुनाव-चिन्ह को पाने कि लालसा होती है…दूसरा पार्टी द्वारा व्हिप जारी करने से जनहित के मुद्दे पर भी प्रतिनिधि व्हिप से बंधा होनें के कारण जनहित के बजाये दलहित में काम करता है।

3- प्रश्न : EVM पे पार्टी का चुनाव-चिन्ह होनें से क्या नुक्सान होता है और हट जानें से क्या बदलाव होगा ?

उत्तर : चुनाव-चिन्ह को ही पार्टी का टिकट कहते हैं, टिकट यानि प्रचलित चुनाव-चिन्ह कमल, पंजा, झाड़ू, साईकिल, हाथी, लालटेन, घड़ी इत्यादि लगातार प्रचार करके ब्रांड बना दिया जाता है, चूँकि EVM पे वही चुनाव-चिन्ह होता है लिहाज़ा कोई भी खड़ा होगा वो EVM पे पार्टी का ब्रांड चिन्ह लगा होनें के कारण जीतने की उम्मीद में टिकटों (चुनाव-चिन्हों) की नीलामी होती है क्यूंकि ब्रांड लोगों के बीच प्रचारित है। याद रहे कि EVM पे पार्टी का नाम नहीं होता है सिर्फ चिन्ह होता है। जब प्रतिनिधि नीलामी से देश की सबसे महंगी बिकाऊ चीज चुनाव-चिन्ह यानि टिकट खरीदेगा तो जीतनें के बाद नीलामी और चुनाव में लगे रुपये को वसूलेगा भी और यहीं से शुरू होता है राजनितिक भ्रष्टाचार और जनप्रतिनिधि बन जाता है दल प्रतिनिधि, यानि आज चुनाव-चिन्हों का चुनाव हो रहा है, प्रत्याशियों का नहीं क्यूंकि कोई जान ही नहीं पाता कि कौन प्रत्याशी है बस तय कर लेता है कि अमुक चुनाव-चिन्ह को वोट देना है, इसीलिए जातिगत राजनीती है जैसे यादव जाति के लोगों को कोई लेना देना नहीं कि कौन लड़ रहा है बस साईकिल को वोट देना है, दलित को नहीं मालूम पर हाथी को वोट देना है, एक धर्म के लोग कमल पे वोट करते हैं, पंजे के निशान पे कमल से नाखुश देंगे, ये लोकतंत्र कहाँ है ये तो पार्टीतंत्र हुआ जो धर्म और जाति आधारित है…परन्तु EVM से चुनाव-चिन्ह हटते ही जनता के बीच प्रत्याशी अपनी पहचान कराने को बाध्य होगा जो आज जनता के बीच जाता ही नहीं, टिकटों की नीलामी ख़त्म हो जाएगी जिससे राजनितिक भ्रष्टाचार कम होगा और पार्टियाँ भी उसी को खड़ा करेंगी जो समाज के बीच रहकर जनता के बीच अपनी पहचान कराया होगा, तब जनप्रतिनिधि बनेगा और जनता के हित में काम करेगा | EVM से चुनाव-चिन्ह के हटने बहुत बड़ा जनहित में बदलाव आएगा।

4- प्रश्न : पार्टियों के व्हिप जारी करनें से क्या नुकसान होता है ?

उत्तर : जनता नें अपना प्रतिनिधित्व और जनहित में काम करनें हेतु सदन भेजा, पर पार्टियों के व्हिप जारी करनें से प्रतिनिधि का मुह बंद हो जाता है और पार्टी के थोपे विचार के आधार पर वोट करनें को बाध्य हो जाता है जिसे लोकतंत्र का गला घोटना कह सकते हैं, व्हिप जारी होना बंद हो तो जो कानून गलत होगा उसे जनता द्वारा चुने प्रतिनिधि विरोध करते पर आज नहीं कर पाते।

5- प्रश्न : क्या होने पर लोकतंत्र पार्टियों के बंधन से मुक्त होगा ? उत्तर : सीधा सिद्धांत है कि वायरस का ईलाज एंटी वायरस होता है | पहला ये कि कोई आदर्श पार्टी अपने पार्टी संविधान में लाये कि व्हिप लागू नहीं करेगी जिससे उस पार्टी का प्रतिनिधि दलहित के बजाये जनहित में काम करेगा और दूसरा ये कि पार्टी का कोई चुनाव-चिन्ह न हो, प्रतिनिधि अपनी फोटो को चुनाव-चिन्ह बताकर चुनाव लड़े जिससे जनता के नियंत्रण में रहेगा और जनता के बीच रहने की बाध्यता होगी तभी वो जीत पायेगा और आगे भी जनहित में ही कार्य करके जीतेगा | परन्तु अफ़सोस ये है कि सभी पार्टियाँ ये जानते हुए भी करना नहीं चाहती क्यूंकि सत्ता पाने कि प्रबल इच्छा रहती है इसीलिए अब जरुरी हो गया है कि एक आदर्श पार्टी इन चीजों को लागू करके आदर्श माडल प्रस्तुत करे जिससे अन्य पार्टियाँ भी करनें को बाध्य हो सकें।

6- प्रश्न : इसके लिए पार्टी बनाये बगैर भी मांग हो सकती है, फिर आदर्श पार्टी कि क्यूँ जरुरत है ?

उत्तर : उक्त बातों की मांग होती रही है पर पार्टियाँ सुनने के बजाये ये बताती हैं कि पार्टी नहीं है इसलिए चिल्ला रहे हैं, इसलिए आदर्श पार्टी अगर उक्त बातें खुद लागू करके अन्य पार्टियों से मांग करेगी तो उन्हें भी विवश होना पड़ेगा लागू करनें को, दूसरी बात ये है कि हाल के वर्षों में सरकारों द्वारा उनके विरुद्ध आवाज़ उठाने पर सामाजिक कार्यकर्ताओं को प्रताड़ित करके फर्जी मुकदमें कराकर जेल तक भेज रही हैं, एक तो वैसे ही जनहित में काम करनें वाले मुट्ठी भर हैं ऐसे में अगर उन्हें बचाव का भी रास्ता है पार्टी में क्यूंकि सरकारें पार्टियों पे हाथ डालनें में संकोच करती हैं और अगर कुछ करती भी हैं तो एक साथ विरोध करनें वाले खड़े हो सकेंगे इसलिए अब ये जरुरी है कि अच्छे सोच के लोग भी संगठित होकर जनहित में संघर्ष करें वर्ना कोई बचेगा ही नहीं।

7- प्रश्न : आदर्श पार्टी चुनाव में उम्मीदवारों को लड़ाएगी ?

उत्तर : हाँ चुनाव लड़ाएगी तभी चुनाव-सुधार के लिए लड़ पायेगी क्यूंकि लोकतंत्र को बंधक होनें में चुनाव की खामी भी काफी हद तक जिम्मेदार है और लोगों के सामने अच्छे लोगों जो सिर्फ कहनें वाले नहीं बल्कि जनहित के लिए संकल्पित होकर विकल्प देंगे | आज विकल्प की कमी से मजबूरन बेईमान, कम बेईमान को चुनना जनता की मज़बूरी होती है भले वो सरकार जनता का कचूमर निकाले, जब सारे बेईमान एक हो सकते हैं तो क्या जनहित में संघर्ष करनें वाले एक होकर उन्ही की भाषा में जवाब नहीं दे सकते हैं ?

8- प्रश्न : आदर्श पार्टी का नाम क्या होगा ?

उत्तर : कोई नई पार्टी बनाने के बजाये राष्ट्रीय राष्ट्रवादी पार्टी जो विगत 5 वर्षों से जनहित में सफल संघर्ष करके हजारों लोगों को लाभ पंहुचा चुकी है और लोकतंत्र को आज़ाद करानें हेतु लोकतंत्र मुक्ति आन्दोलन चलाकर तमाम चुनावसुधार जनहित में करवा चुकी है पर कभी पार्टी नें चुनाव लड़ कर वोट नहीं माँगा इसलिए उसी के साथ हो जाएँ, राष्ट्रीय राष्ट्रवादी पार्टी का अतीत ही उसकी विस्वसनीयता है, पर अब समय आ गया है कि आदर्श पार्टी का माडल दे अन्य पार्टियों को विवश करके लोकतंत्र को आज़ाद कराये।

9- प्रश्न : हमें क्यूँ राष्ट्रीय राष्ट्रवादी पार्टी के साथ होना चाहिये ?

उत्तर : वैसे भी आज रामराज तो है नहीं लिहाज़ा राष्ट्रीय राष्ट्रवादी पार्टी के साथ संघर्ष करनें में कोई हर्ज़ तो है नहीं, चूँकि इसका इतिहास गवाह है कि इस पार्टी नें लम्बे समय से लोकतंत्र मुक्ति आन्दोलन चलाकर तमाम चुनाव सुधार और जनहित संघर्ष में सफल रही है इसलिए यकीन करके साथ होना चाहिये, ज्यादातर के ख़राब होने से कोई ठीक नहीं होगा ये नहीं माना जा सकता .

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