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आखिर किस मजबूरी में खामोश है भारत की आवाज?

Three Indian seafarers were tragically killed when U.S. military forces fired on a Palau-flagged oil tanker in the Gulf of Oman. U.S. Central Command stated the strike occurred after the vessel allegedly violated a blockade by attempting to transport Iranian oil and repeatedly ignored warnings to comply

जहाजों पर हमले, भारतीयों की मौत और विदेश नीति पर उठते गंभीर सवाल

लेखक: संतोष कुमार सिंह, कार्यकारी संपादक, thejanmat.com

भारत जैसे विशाल और गौरवशाली राष्ट्र के लिए इससे बड़ी चिंता की बात क्या होगी कि आज देश का आम नागरिक अपने ही नेतृत्व से सवाल पूछने को मजबूर हो जाए कि आखिर भारत की आवाज इतनी धीमी क्यों पड़ गई है? एक समय था जब भारत की पहचान एक ऐसे राष्ट्र के रूप में होती थी जो अपनी स्वतंत्र सोच, स्पष्ट नीति और मजबूत निर्णय क्षमता के लिए जाना जाता था। भारत ने हमेशा दुनिया को शांति, सह-अस्तित्व और सहयोग का संदेश दिया। लेकिन शांति और कमजोरी के बीच एक बहुत पतली रेखा होती है, और आज देश का नागरिक उसी रेखा को लेकर चिंतित है।

आज सवाल केवल किसी एक घटना का नहीं है। सवाल उस सोच का है जिसके तहत भारत अपने नागरिकों, अपने हितों और अपनी संप्रभुता की रक्षा करेगा या नहीं। ओमान की खाड़ी जैसे रणनीतिक समुद्री क्षेत्र से जुड़ी हालिया घटनाओं ने पूरे देश को झकझोर दिया है। यदि रिपोर्टों के अनुसार मिसाइल हमले में तीन भारतीय नागरिकों की जान चली गई, तो यह केवल तीन लोगों की मौत नहीं है। यह तीन परिवारों के सपनों का अंत है, तीन घरों की उम्मीदों का टूटना है और पूरे देश के लिए एक गंभीर सुरक्षा चेतावनी है। तीन होनहार भारतीय नागरिक, जो अपने परिवारों के बेहतर भविष्य के लिए समुद्र के रास्तों पर काम कर रहे थे, अचानक हिंसा का शिकार हो गए। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर उनकी मौत का जवाब कौन देगा?

क्या भारतीय नागरिकों की सुरक्षा केवल विदेश मंत्रालय के बयान तक सीमित रह जाएगी? क्या सरकार की जिम्मेदारी केवल संवेदना व्यक्त करने तक पूरी हो जाएगी? देश जानना चाहता है कि आखिर वह कौन सी व्यवस्था है जो अपने नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं कर पा रही।

समुद्री सुरक्षा पर गंभीर सवाल -समुद्री रास्ते किसी भी देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ होते हैं। भारत जैसे व्यापारिक राष्ट्र के लिए समुद्री मार्ग केवल जहाजों की आवाजाही का रास्ता नहीं, बल्कि करोड़ों भारतीयों के रोजगार, व्यापार और विकास से जुड़ा हुआ आधार है।

ओमान की खाड़ी और आसपास के क्षेत्र दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों में आते हैं। ऐसे क्षेत्र में यदि लगातार तनाव की स्थिति बनती है, भारतीय हितों से जुड़े जहाजों पर खतरे पैदा होते हैं और भारतीय नागरिकों की जान जाती है, तो यह सामान्य घटना मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यह सीधा सवाल है कि क्या भारत की समुद्री सुरक्षा नीति इतनी मजबूत है कि वह अपने नागरिकों और अपने आर्थिक हितों को सुरक्षित रख सके? एक मजबूत राष्ट्र केवल यह दावा नहीं करता कि वह शक्तिशाली है। उसकी शक्ति तब दिखाई देती है जब संकट के समय वह अपने नागरिकों के साथ खड़ा होता है।

विदेश नीति या सिर्फ संतुलन की राजनीति?

आज देश के सामने सबसे बड़ा सवाल विदेश नीति को लेकर है।क्या भारत की विदेश नीति केवल बड़े देशों के साथ संबंध बनाए रखने तक सीमित हो गई है? क्या रणनीतिक साझेदारी के नाम पर भारत उन मुद्दों पर भी चुप रहेगा जहां भारतीय हित सीधे प्रभावित हो रहे हैं? कूटनीति का मतलब यह नहीं कि राष्ट्र अपनी आवाज खो दे।

दुनिया के कई छोटे देश भी अपने नागरिकों की सुरक्षा और सम्मान के लिए अंतरराष्ट्रीय मंचों पर खुलकर अपनी बात रखते हैं। ऐसे में भारत जैसे विशाल राष्ट्र से अपेक्षा और अधिक बढ़ जाती है। भारत को दोस्ती भी रखनी चाहिए, संवाद भी करना चाहिए, लेकिन जब बात भारतीय जीवन और राष्ट्रीय सम्मान की हो तो कोई भी समझौता स्वीकार नहीं होना चाहिए।

सोशल मीडिया के दौर में जनता सब देख रही है आज का समय ऐसा है जहां कोई भी घटना दुनिया से छिप नहीं सकती।

विदेशों में भारतीय ध्वज के अपमान की तस्वीरें हों, भारतीय नागरिकों के साथ दुर्व्यवहार के वीडियो हों या भारत के खिलाफ किसी भी प्रकार की टिप्पणी सब कुछ कुछ ही मिनटों में करोड़ों लोगों तक पहुंच जाता है। जब एक सामान्य भारतीय इन घटनाओं को देखता है तो उसके मन में सवाल उठता है कि आखिर हमारे नेतृत्व की प्रतिक्रिया इतनी कमजोर क्यों दिखाई देती है? जिस तिरंगे के लिए सीमा पर खड़ा जवान अपना जीवन न्योछावर करता है, उस तिरंगे के अपमान पर देश की आवाज बुलंद क्यों नहीं होती? राष्ट्र का सम्मान केवल भाषणों और नारों से नहीं बचता। राष्ट्र का सम्मान तब बचता है जब सरकार हर परिस्थिति में अपने लोगों के साथ खड़ी दिखाई दे।

राष्ट्रवाद केवल शब्द नहीं, जिम्मेदारी है

आज राजनीति में राष्ट्रवाद शब्द का सबसे ज्यादा इस्तेमाल होता है। लेकिन असली राष्ट्रवाद क्या है?

क्या राष्ट्रवाद केवल चुनावी मंचों पर बड़े-बड़े दावे करने का नाम है?या फिर राष्ट्रवाद तब दिखाई देता है जब विदेशों में रहने वाला एक भारतीय सुरक्षित महसूस करे? जब एक भारतीय मजदूर, कर्मचारी, व्यापारी या छात्र विदेश जाता है तो वह केवल अपना नहीं बल्कि भारत का प्रतिनिधित्व करता है। अगर वह सुरक्षित नहीं है, अगर उसकी जान खतरे में है, तो यह केवल व्यक्तिगत नुकसान नहीं बल्कि राष्ट्रीय चिंता का विषय है।

भारत को विश्व शक्ति बनाने की बातें की जाती हैं। लेकिन विश्व शक्ति केवल आंकड़ों, अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों और प्रचार अभियानों से नहीं बनती। विश्व शक्ति वह राष्ट्र होता है जिसकी बात दुनिया सुनती है। विश्व शक्ति वह राष्ट्र होता है जिसके नागरिकों को दुनिया के किसी भी कोने में सम्मान मिलता है। विश्व शक्ति वह राष्ट्र होता है जो अपने हितों की रक्षा करने में सक्षम होता है। अगर भारत लगातार ऐसी घटनाओं पर केवल चिंता व्यक्त करता रहेगा और ठोस कदम नहीं दिखाई देंगे, तो सवाल उठेंगे कि आखिर हमारी ताकत वास्तविक है या केवल राजनीतिक भाषणों तक सीमित है?

प्रधान सेवक जी, देश आपसे जवाब चाहता है। देश पूछना चाहता है हमारे तीन होनहार नागरिकों की मौत का जिम्मेदार कौन है? भारतीय जहाजों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी किसकी है? विदेशों में भारतीयों के सम्मान और सुरक्षा की गारंटी कौन देगा? क्या भारत इतना कमजोर हो गया है कि उसके नागरिकों की जान जाने के बाद भी केवल औपचारिक प्रतिक्रिया दी जाए?

लोकतंत्र में सवाल पूछना विरोध नहीं होता। सवाल पूछना जनता का अधिकार है और सरकार की जिम्मेदारी है कि वह इन सवालों का जवाब दे। भारत को ऐसी विदेश नीति चाहिए जहां मित्रता भी हो, लेकिन आत्मसम्मान सबसे ऊपर हो।

क्योंकि इतिहास उन्हीं राष्ट्रों को सम्मान देता है जो अपने नागरिकों की रक्षा करना जानते हैं। भारत केवल एक देश नहीं है, यह करोड़ों लोगों की उम्मीद है।और जब उन उम्मीदों पर चोट होती है, तो सरकार को केवल बयान नहीं बल्कि मजबूत कार्रवाई से जवाब देना पड़ता है।

लेखक: संतोष कुमार सिंह, कार्यकारी संपादक, thejanmat.com

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