Opinion ZoneNationWorld by Us
Trending

ईरान (IRAN )की संप्रभुता पर संकट, साम्राज्यवादी इजरायल के साथ ट्रंप की सोच और वैश्विक शर्मिंदगी

अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप की यह नीति कोई आकस्मिक नहीं यह सुनियोजित साम्राज्यवादी लूट है। अमेरिका और उसके सहयोगी ऊर्जा सुरक्षा के नाम पर मध्य पूर्व को नियंत्रित करना चाहते हैं।

ईरान/IRAN और भारत का संबंध कोई साधारण राजनयिक रिश्ता नहीं है यह सदियों पुरानी सभ्यताओं का गहरा, नैतिक और सांस्कृतिक बंधन है। प्राचीन फारसी साम्राज्य से लेकर मुगल काल तक, फारसी भाषा, कविता, सूफी दर्शन और व्यापारिक मार्गों (सिल्क रोड) ने दोनों देशों को एक-दूसरे से जोड़ा। भारत में फारसी प्रभाव इतना गहरा रहा कि दरबारी भाषा फारसी बनी, और आज भी उर्दू में फारसी शब्दों की भरमार है। दोनों ही देशों ने विदेशी आक्रमणों का सामना किया भारत ने ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ 1857 की महान क्रांति देखी, जिसमें बाबू वीर कुंवर सिंह जैसे वरिष्ठ योद्धाओं ने 80 वर्ष की उम्र में भी फिरंगियों के छक्के छुड़ा दिए। ईरान ने भी 19वीं-20वीं सदी में ब्रिटिश-रूसी हस्तक्षेप, 1953 में मोसद्देग की चुनी हुई सरकार को सीआईए द्वारा उखाड़ फेंकने और 1979 की इस्लामिक क्रांति के बाद लगातार अमेरिकी-इजराइली दबाव का मुकाबला किया। यह साझा इतिहास साम्राज्यवाद-विरोधी संघर्ष की एकता का प्रतीक है।

लेकिन 28 फरवरी 2026 को जब अमेरिका और इजराइल के संयुक्त सैन्य अभियान में ईरान के सर्वोच्च नेता आयतोल्लाह अली खामेनेई की हत्या कर दी गई जहाँ करीब 180 बच्चे भी सदा के लिए काल के गाल में समा गए , तो यह न केवल ईरान की संप्रभुता पर सबसे बड़ा हमला था, बल्कि पूरी मानवता की गरिमा, नैतिकता और स्वतंत्रता पर घोर प्रहार था। यह हत्या किसी सर्जिकल स्ट्राइक या डिकैपिटेशन ऑपरेशन का नाम नहीं ले सकती यह खुले तौर पर एक संप्रभु राष्ट्र के आंतरिक मामलों में सशस्त्र घुसपैठ, राज्य प्रमुख की हत्या और अंतरराष्ट्रीय कानून का घोर उल्लंघन है। संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुच्छेद 2(4) में स्पष्ट है कि किसी भी राज्य की क्षेत्रीय अखंडता या राजनीतिक स्वतंत्रता के विरुद्ध बल प्रयोग निषिद्ध है। फिर भी ट्रंप प्रशासन और इजराइल ने इसे महान उपलब्धि बताकर जश्न मनाया। यह वहशीपन है जो लोकतंत्र और मानवाधिकार के नाम पर हत्याओं का खेल खेलता आया है।

ट्रंप ने सोशल पोस्ट में इसे इतिहास की सबसे बड़ी जीत कहा, जबकि इजराइली वायुसेना ने हमले का नेतृत्व किया। खामेनेई की हत्या उनके आधिकारिक आवास/कार्यालय में की गई, जहाँ वे ईरान की गणतंत्र व्यवस्था को मजबूत करने में लगे थे। इस हमले के तुरंत बाद ईरान के प्रमुख तेल शोधन संयंत्रों, निर्यात टर्मिनलों (खार्ग द्वीप) और परमाणु सुविधाओं पर भी हमले हुए। परिणामस्वरूप ईरान की दैनिक तेल उत्पादन क्षमता में 40-50% की कमी आई। वैश्विक तेल बाजार में तेल की कीमतें में 30% से 40 % से अधिक बढ़ गईं। ब्रेंट क्रूड 140 डॉलर प्रति बैरल के पार चला गया। यूरोप में पहले से ही रूस-यूक्रेन युद्ध के कारण ऊर्जा संकट था अब ईरानी तेल की कमी ने स्थिति को और भयावह बना दिया। जर्मनी, फ्रांस, इटली जैसे देशों में घरेलू गैस और बिजली की कीमतें दोगुनी तिगुनी हो गईं। एशिया में पाकिस्तान, बांग्लादेश, इंडोनेशिया जैसे विकासशील देशों में पेट्रोल-डीजल की कीमतें 200-250 रुपये प्रति लीटर तक पहुंच गईं। आम जनता पर महंगाई का बोझ इतना बढ़ा कि कई देशों में विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए। भारत में घरेलु गैस के लिए क्या शहर क्या गाँव उद्योग होटल यहाँ तक की सड़क किनारे चाय की टपरी पर भी गैस के कमी को देखा जा सकता है..

बड़ी जिम्मेदारी से यह कह रहें है अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप की यह नीति कोई आकस्मिक नहीं यह सुनियोजित साम्राज्यवादी लूट है। अमेरिका और उसके सहयोगी ऊर्जा सुरक्षा के नाम पर मध्य पूर्व को नियंत्रित करना चाहते हैं। ईरान का तेल बाजार से बाहर होना अमेरिकी शेल ऑयल और सऊदी-अरब जैसे सहयोगियों को फायदा पहुंचाता है। लेकिन इस फायदे की कीमत पूरी मानवता चुका रही है भुखमरी, गरीबी, बेरोजगारी और अराजकता के रूप में। क्या यह अमेरिका फर्स्ट है? नहीं, यह तो सबसे पहले लूट, फिर दुनिया को जलाओ की नीति है।

इतिहास गवाह है इराक में सद्दाम के बाद तेल उत्पादन बढ़ा लेकिन लाखों मौतें हुईं, लीबिया में गद्दाफी के बाद अराजकता फैली, सीरिया, यमन में युद्ध ने करोड़ों लोगों को विस्थापित किया। अब ईरान। साम्राज्यवाद कभी शांति नहीं लाता यह केवल संकट पैदा करता है।

ट्रंप की इन क्रूर कार्यकलापो के साथ ही वह एक सनकी बड़बोला जेफ्री एप्सटीन की फाइलों में भी समाहित है जिसका विस्तार से खुलासा हो रहा है। ये फाइलें जिनमें हाई-प्रोफाइल व्यक्तियों के यौन शोषण, नाबालिग लड़कियों की तस्करी, ब्लैकमेल और नैतिक पतन की कहानियाँ दर्ज हैं पूरी मानवता को शर्मसार कर रही हैं। ट्रंप का नाम इन फाइलों में कई बार आया है; उनके पुराने बयान, फोटो और एप्सटीन के साथ संबंध अब सबके सामने हैं। इजराइल के कुछ शीर्ष नेताओं और लॉबी के नाम भी इनमें जुड़े हैं। ऐसे में खामेनेई जैसी हत्या को नैतिक युद्ध बताना कितना पाखंड है? ये लोग जो खुद यौन अपराधों, मानव तस्करी और भ्रष्टाचार के घेरे में हैं, आज दुनिया को मानवाधिकार का उपदेश दे रहे हैं। एप्सटीन फाइलें साबित करती हैं कि साम्राज्यवादी शक्तियों का नैतिक दिवालियापन पूर्ण है। वे राष्ट्रों को लूटते हैं, नेताओं की हत्या करते हैं और खुद के अपराध छिपाते हैं। यह दोहरा चरित्र मानवता के लिए सबसे बड़ा खतरा है। दुनिया को इन फाइलों से सीख लेनी चाहिए सच्ची स्वतंत्रता तभी आएगी जब ऐसी शक्तियों का दमन हो हर स्तर पर।

भारत-ईरान संबंध हमेशा नैतिक रहे। चहबहार बंदरगाह भारत की अफगानिस्तान पहुंच का महत्वपूर्ण मार्ग है। ईरान भारत को सस्ता तेल देता रहा, प्रतिबंधों के बावजूद। लेकिन आज जब ईरान पर सबसे बड़ा हमला हुआ, भारत चुप है। भारत के यशश्वी प्रधानमंत्री मोदी की विदेश नीति फादरलैंड और मदरलैंड के नाम पर अमेरिका-इजराइल के साथ इतनी गहरी साझेदारी में चली गई है कि संप्रभुता और मानवता की रक्षा पीछे छूट गई। फादरलैंड (इजराइल) और मदरलैंड (भारत ) जैसे काल्पनिक या व्यंग्यात्मक संदर्भों में मोदी सरकार की नीति भारत को शर्मसार कर रही है। जहां 1857 के क्रांतिकारी फिरंगियों से लड़े, वहां आज भारत साम्राज्यवादियों के साथ खड़ा दिख रहा है प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से ।

भारत को संयुक्त राष्ट्र में इस हत्या की निंदा करनी चाहिए थी। ईरान को समर्थन देना चाहिए था। ऊर्जा संकट से निपटने के लिए रूस, वेनेजुएला जैसे देशों के साथ वैकल्पिक गठबंधन बनाना चाहिए था। लेकिन मोदी सरकार की चुप्पी या अमेरिका-समर्थक ( इजरायल समर्थक आरएसएस) बयान भारत की गरिमा को कलंकित कर रहे हैं। यह नीति हिंदुत्व के नाम पर राष्ट्रवाद दिखाती है, लेकिन वास्तव में विदेशी शक्तियों के आगे झुकाव है। भारत जैसे देश, जो खुद उपनिवेशवाद का शिकार रहे, को ईरान के साथ खड़े होकर अपनी नैतिक जिम्मेदारी निभानी चाहिए थी। दुर्भाग्य है कि ऐसा नहीं हुआ।

सनद रहे खामेनेई मर गए, लेकिन उनका प्रतिरोध जिंदा है। ईरानी क्रांतिकारी गार्ड (IRGC), हिजबुल्लाह, अंसारुल्लाह और जनता ने जवाबी हमले किए। अमेरिकी ठिकानों, इजराइली हितों पर ड्रोन और मिसाइल हमले हुए। ट्रंप की महान उपलब्धि अब उनके लिए काला अध्याय बन गई है। जैसे बाबू वीर कुंवर सिंह ने जगदीशपुर में घायल होकर भी अंग्रेजों को हराया, उसी तरह ईरानी योद्धा दिखा रहे हैं कि संप्रभुता के लिए संघर्ष कभी खत्म नहीं होता। यह प्रतिरोध धार्मिक नहीं मानवता का है। हर राष्ट्र को अपनी मिट्टी, नीति और गरिमा पर अधिकार है।

आज दुनिया को साम्राज्यवाद के विरुद्ध एकजुट होना चाहिए। विकासशील देशों को BRICS, SCO जैसे मंचों पर मजबूत आवाज उठानी चाहिए। भारत को अपनी स्वतंत्र विदेश नीति अपनानी चाहिए फादरलैंड-मदरलैंड के झूठे सपनों से ऊपर उठकर। एप्सटीन फाइलें और ऊर्जा संकट हमें सिखाते हैं कि ये शक्तियां मानवता को बर्बाद कर रही हैं। ईरान का संघर्ष प्रेरणा है यह दिखाता है कि बूढ़ा शेर मरने के बाद भी जिंदा रहता है।

इतिहास स्वतंत्रता और सम्प्रभुता के पक्ष में है। साम्राज्यवाद आज नहीं तो कल हारेगा ही भारत की जनता, ईरान की जनता और पूरी मानवता एक होकर इस वहशी व्यवस्था का विरोध करे। स्वतंत्रता, संप्रभुता और नैतिकता ही सच्ची मानवता का आधार हैं।
जय हिंद! जय ईरान! जय स्वतंत्र मानवता!

(यह लेख लेखक के निजी विचार हैं और thejanmat.com की संपादकीय नीति से सहमत होना आवश्यक नहीं।)
राजेश कुमार सिंह (thejanmat.com के लिए विशेष)

Tags

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
Close