ECI-मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति- लोकतंत्र की शुचिता पर सवाल
पिछले दिनों विधानसभा चुनाव परिणामों के अलावा एक शख्स ज्ञानेश कुमार ज्यादा चर्चा में रहे, जो वर्तमान समय में भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त हैं।

ECI- मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति -संविधान के अनुच्छेद 324(2) में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति संसद द्वारा बनाए गए किसी कानून के अधीन रहते हुए राष्ट्रपति द्वारा की जाएगी। स्वतंत्रता के बाद लंबे समय तक केवल एक चुनाव आयुक्त होता था, जिसकी नियुक्ति प्रधानमंत्री और मंत्रिपरिषद की सलाह पर राष्ट्रपति करते थे।
पहला बड़ा संघर्ष 1987 के राष्ट्रपति चुनाव के दौरान शुरू हुआ, जब देश के मुख्य चुनाव आयुक्त आर.वी.एस. पारीक (आर. वी. एस. परी शास्त्री) थे और प्रधानमंत्री राजीव गांधी। तल्खी बढ़ती गई और 16 अक्टूबर 1989 तक आते-आते राजीव गांधी सरकार ने एक मुख्य चुनाव आयुक्त के साथ दो अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति कर दी।
चुनाव के बाद वी.पी. सिंह सरकार बनी। उन्होंने एक चुनाव आयुक्त को हटा दिया। उस आयुक्त ने इसके खिलाफ न्यायालय का रुख किया। इसी बीच एम.एस. धनोआ बनाम भारत संघ (AIR 1991) मामले में सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया कि राष्ट्रपति जितने उचित समझें, उतने चुनाव आयुक्त नियुक्त कर सकते हैं और यदि कार्य समाप्त हो जाए तो पद समाप्त भी कर सकते हैं। इस निर्णय को अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती।
इस फैसले का असली प्रयोग नरसिम्हा राव सरकार ने तब किया, जब 1990 में नियुक्त कठोर प्रशासक मुख्य चुनाव आयुक्त टी.एन. शेषन ने नवंबर 1993 में कई राज्यों के विधानसभा चुनावों के दौरान सरकार से सीधे टकराव मोल ले लिया। यह टकराव मुख्यतः चुनाव के दौरान पर्याप्त सुरक्षा बल उपलब्ध न कराए जाने और चुनाव ड्यूटी पर लगे प्रशासनिक अधिकारियों की निष्पक्षता को लेकर था।
2 अक्टूबर 1993 को राष्ट्रपति ने अध्यादेश जारी करके एक सदस्यीय निर्वाचन आयोग को दो अन्य चुनाव आयुक्त जोड़कर बहुसदस्यीय बना दिया। इसे पुख्ता करने का काम पाँच सदस्यीय सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने टी.एन. शेषन बनाम भारत संघ मामले में किया। कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि संसद द्वारा पारित अधिनियम संवैधानिक है, मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्तों की शक्तियाँ समान हैं तथा मतभेद की स्थिति में बहुमत से फैसला लिया जाएगा।
अब विवाद फिर गहराया है। मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए अनूप बरनवाल बनाम भारत संघ मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वर्तमान व्यवस्था में सत्तारूढ़ दल का एकाधिकार है। नियुक्ति प्रक्रिया को पारदर्शी और स्वतंत्र बनाने के लिए, जब तक संसद कोई कानून नहीं बना लेती, तब तक नियुक्ति समिति (कॉलेजियम) में प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और भारत के मुख्य न्यायाधीश शामिल होने चाहिए।
इस फैसले के तुरंत बाद भारत सरकार ने 1991 के मुख्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति की शर्तें) नियमावली में बदलाव करते हुए मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति) अधिनियम, 2023 लाया। इसे पहले राज्यसभा और फिर 21 दिसंबर 2023 को लोकसभा में पारित कर अधिनियम बना दिया गया।

इस नए कानून के अनुसार नियुक्ति समिति तीन सदस्यीय होगी प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और प्रधानमंत्री द्वारा नामित एक केंद्रीय मंत्री। इस समिति की सलाह पर राष्ट्रपति मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति करेंगे।
यह स्पष्ट रूप से साबित करता है कि सुप्रीम कोर्ट जिस असंवैधानिकता की बात पुरानी प्रधानमंत्री-मंत्रिपरिषद वाली व्यवस्था को लेकर कर रहा था, उसी सत्तारूढ़ दल के वर्चस्व को इस नई व्यवस्था में भी बरकरार रखा गया है। प्रधानमंत्री और उनके नामित मंत्री विपक्ष के नेता की राय को आसानी से नकार सकते हैं। इससे पूरी चुनाव प्रक्रिया को प्रभावित करने और लोकतंत्र की शुचिता को समाप्त करने का खतरा पैदा हो जाता है।
इसीलिए जब यह बिल लोकसभा में पेश हुआ तो कांग्रेस ने वॉकआउट किया।
सवाल यह है कि जब वर्ष 2011 में लोकसभा में विपक्ष के नेता लालकृष्ण आडवाणी ने सरकार की “दादागिरी” पर सवाल उठाते हुए सुझाव दिया था कि नियुक्ति समिति पाँच सदस्यीय हो जिसमें प्रधानमंत्री, लोकसभा और राज्यसभा में विपक्ष के नेता, कानून मंत्री तथा भारत के मुख्य न्यायाधीश शामिल हों तो राहुल गांधी और कांग्रेस को उनकी इस राय पर सार्थक पहल करनी चाहिए थी। आज भाजपा को भी अपने इस वरिष्ठ नेता के सुझाव को ध्यान में रखना चाहिए था।
लेकिन सत्ता की अपनी विसंगतियाँ होती हैं। यही हमारे लोकतंत्र की सबसे बड़ी कमजोरी है कि हमारे यहाँ सबसे मजबूत राजनीतिक दल ही लोकतंत्र और संविधान की मर्यादा को तार-तार करते हैं। यह अत्यंत दुखद है।
भविष्य में यह कार्यप्रणाली लोकतंत्र और लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर करके भारत को अराजकता की ओर धकेल सकती है।
डॉ. शम्मी कुमार सिंह प्रत्याशी – एम.एल.सी. (स्नातक), वाराणसी खंड
अस्वीकरण– यह लेख लेखक डॉ. शम्मी कुमार सिंह की व्यक्तिगत राय है। thejanmat.com केवल इसे प्रकाशित कर रहा है। इस लेख की सामग्री के लिए thejanmat.com पोर्टल किसी भी प्रकार की जिम्मेदारी नहीं लेता है।



