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बिहार के Jungle Raj जंगल राज की सच्चाई मीडिया की साजिश और सामाजिक न्याय की लड़ाई?

अगर किसी झूठ को प्रचार तंत्र का सहयोग और उच्च सवर्ण वर्ग का साथ मिल जाये तो यह जंगल राज जैसे परिकल्पना को जन्म दे सकता है अपनी बतानी नहीं और दूसरे की छुपानी नहीं।

बिहार का जंगल राज Jungle Raj शब्द आज भी राजनीतिक बहसों में गूंजता है। यह शब्द मुख्य रूप से 1990 से 2005 तक लालू प्रसाद यादव और उनकी पत्नी राबड़ी देवी के शासनकाल से जुड़ा है।

मुख्यधारा की मीडिया और विपक्षी पार्टियां इसे अराजकता, अपराध और भ्रष्टाचार का प्रतीक बताती हैं, लेकिन यह पूरी सच्चाई नहीं है। यह नैरेटिव एक सुनियोजित साजिश का हिस्सा है, जो उन उच्च वर्गों की ओर से रची गई थी जो सदियों से बिहार की सत्ता पर काबिज थे। इन उच्च वर्गों ने पिछड़ी जातियों के उदय को बर्दाश्त नहीं किया। लालू यादव की सरकार ने सामाजिक न्याय की नींव रखी, पिछड़ों, दलितों और अल्पसंख्यकों को आवाज दी, लेकिन इसके बदले उन्हें जंगल राज का तमगा दिया गया।

जहां हम ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, लालू के उदय, अपराधों की सच्चाई, मीडिया की भूमिका और सामाजिक बदलावों पर असली जंगल राज वह था जो सदियों से चली आ रही जातीय असमानता और जमींदारी प्रथा में छिपा था। हम इस नैरेटिव को तथ्यों के आधार ताकि सच्चाई सामने आए।

बिहार की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और जातीय असमानता की जड़ें

बिहार की कहानी समझने के लिए हमें आजादी से पहले के दौर में जाना होगा। ब्रिटिश काल में जमींदारी प्रथा ने बिहार को गुलाम बना रखा था। उच्च वर्ग मुख्य रूप से भूमिहार, ब्राह्मण, राजपूत और कायस्थ ने जमीनों पर कब्जा जमाया। आज भी गांवों में एक-दो परिवारों के पास 100 से 2000 एकड़ जमीन है, जबकि 80-90% आबादी भूमिहीन है। 1950 के दशक में जमींदारी उन्मूलन कानून आया, लेकिन व्यावहारिक रूप से उच्च वर्गों ने इसे नाकाम कर दिया। वे प्रशासन, न्यायपालिका और मीडिया में हावी थे, इसलिए भूमि सुधार कभी लागू नहीं हो सके।

पिछड़ी जातियां यादव, कुर्मी, कोइरी, पासवान, चमार आदि सदियों से शोषित रहीं। वे मजदूरी करतीं, लेकिन उनकी आवाज दबाई जाती। 1980 के दशक तक कांग्रेस की सरकारों में उच्च वर्गों का दबदबा था। भगलपुर दंगे (1989) में मुसलमानों का कत्लेआम हुआ, जिसमें 1000 से ज्यादा मौतें हुईं, ज्यादातर गरीब बुनकरों की। यह दंगे उच्च वर्गों की साजिश का हिस्सा थे, जो पिछड़ों के उभार से डरते थे। इस असमानता ने सामाजिक न्याय की मांग को जन्म दिया। करपूरी ठाकुर ने 1970 के दशक में पिछड़ों के लिए आरक्षण की शुरुआत की, लेकिन असली क्रांति लालू यादव ने की। वे जनता दल से उभरे, और 1990 में मुख्यमंत्री बने। उनका नारा था भूरिबल हटाओ (भूमिहार, राजपूत, ब्राह्मण, लाला यानी कायस्थ को हटाओ)। यह उच्च वर्गों के लिए चुनौती था, क्योंकि अब पिछड़े चारपाई पर बैठकर अपनी बात रखने लगे।

लालू प्रसाद यादव का उदय सामाजिक न्याय की शुरुआत, लालू प्रसाद यादव का जन्म 1948 में एक गरीब यादव परिवार में हुआ। पटना यूनिवर्सिटी से राजनीति में कदम रखा, जेपी आंदोलन में सक्रिय रहे। 1977 में लोकसभा पहुंचे, लेकिन असली प्रभाव 1990 में मुख्यमंत्री बनने से पड़ा। 1990 के बिहार विधानसभा चुनाव में जनता दल ने बहुमत हासिल किया, लेकिन मुख्यमंत्री पद के लिए आंतरिक संघर्ष था। तत्कालीन प्रधानमंत्री वीपी सिंह जी राम सुंदर दास को मुख्यमंत्री बनाना चाहते थे, लेकिन लालू प्रसाद यादव ने देवी लाल और युगपुरुष चंद्रशेखर जैसे नेताओं का समर्थन हासिल किया। विशेष रूप से, पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर, जो जनता दल में वीपी सिंह के प्रतिद्वंद्वी थे, ने लालू को मजबूत समर्थन दिया। चंद्रशेखरजी की रणनीतिक मदद से लालू ने उच्च वर्गों के दबदबे को चुनौती दी और मुख्यमंत्री पद हासिल किया। इस प्रकार, चंद्रशेखर जी ने लालू के हाथों में बिहार की कमान सौंपी, जो सामाजिक न्याय की दिशा में एक बड़ा कदम था। यही कारण रहा कि जब चंद्रशेखर जी कार्यवाहक प्रधानमंत्री रहते चुनाव में गए तो आरएसएस ने यह भर्म फैलाया की देश में जितने पेट्रोल पम्प है जो वायुयान को पेट्रोल देते है सभी चंद्रशेखर जी के है और इन्होने देश का सारा सोना बेच दिया।

लालू ने पिछड़ों को सशक्त किया सरकारी नौकरियों में आरक्षण बढ़ाया, उच्च वर्ग के अफसरों को ट्रांसफर कर पिछड़ों को पद दिए। 1993 में उन्होंने अंग्रेजी को स्कूलों में वापस लाया, जो पिछड़ों के लिए एंटी-एलीट कदम था। उनकी सरकार ने दलितों और पिछड़ों को इज्जत दी। मुसहर जाति के लोग बताते हैं कि लालू के दौर में वे पहली बार उच्च वर्गों के सामने सिर उठाकर बोल सके। चुनावों में पोलिंग बूथ उच्च वर्गों के गांवों से हटाकर पिछड़ों के गांवों में रखे गए, ताकि दबाव न हो। लालू ने एलके आडवाणी की रथ यात्रा रोकी, जो मुसलमानों को सुरक्षा का एहसास दिलाया। लेकिन यह बदलाव उच्च वर्गों को रास नहीं आया। वे मीडिया, प्रशासन और न्यायपालिका में थे। आरएसएस और मनुवादी सोच से प्रेरित होकर उन्होंने विरोध शुरू किया। भूमिहार और राजपूतों ने निजी सेनाएं बनाईं, जैसे रणवीर सेना, जो पिछड़ों पर हमले करती। 1991 में सवर्ण लिबरेशन फ्रंट ने 10 दलित महिलाओं का गैंगरेप और हत्या की। इसके जवाब में नक्सलियों ने उच्च वर्गों पर हमले किए।
लालू की सरकार ने कुछ मामलों में पिछड़ों को न्याय दिया, जैसे मियांपुर नरसंहार (2000) के बाद रणवीर सेना पर कार्रवाई। लेकिन उच्च वर्गों ने इसे “जंगल राज” का नाम दिया।

जंगल राज का दौर और अपराध की सच्चाई या साजिश? 1990-2005 का दौर जंगल राज कहलाया, लेकिन अपराध वाकई बढ़े? आंकड़े बताते हैं कि यह मिथ है। लालू के दौर में क्राइम रेट्स बाद के दौर से ज्यादा अलग नहीं थे। अपहरण और हत्याएं पहले भी थीं, लेकिन मीडिया ने इन्हें बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया। उच्च वर्गों ने संगठित अपराध बढ़ाया। वे पिछड़ों पर हमले करते, और जब पिछड़े जवाब देते, तो इसे अराजकता कहा जाता। उदाहरण: शिल्पी जैन-गौतम सिंह हत्या (1999)। यह केस राबड़ी देवी के भाई सद्हु यादव से जुड़ा, लेकिन जांच में इसे सुसाइड बताया गया। परिवार का कहना था कि यह रेप और मर्डर था, लेकिन उच्च वर्ग मीडिया ने इसे जंगल राज का प्रतीक बनाया।

चारा घोटाला (950 करोड़ का घोटाला) में लालू को दोषी ठहराया गया, लेकिन यह भ्रष्टाचार उच्च वर्ग के अफसरों से शुरू हुआ था। लालू ने राबड़ी को सीएम बनाया, जो उच्च वर्गों को और गुस्सा दिलाया। अपराधों में मोहम्मद शहाबुद्दीन जैसे लोग शामिल थे, लेकिन वे उच्च वर्गों के अपराधों का जवाब थे।नक्सली और कम्युनिस्टों ने पिछड़ों को ट्रेनिंग दी, क्योंकि उच्च वर्गों की सेनाएं जैसे रणवीर सेना ने सिनारी नरसंहार (1999) में 34 भूमिहारों को मारा, लेकिन यह पिछड़ों के खिलाफ हमलों का रिएक्शन था।
मीडिया की भूमिका सवर्णों की साजिश और मीडिया पर सवर्णों का कब्जा था। वे केवल उच्च वर्ग की कहानियां दिखाते। जंगल राज का नैरेटिव मीडिया ने बनाया, जैसे पटना हाईकोर्ट के जज ने 1997 में कहा, लेकिन यह संदर्भ से बाहर था। कुछअख़बार , पत्रिकाएं और मिडिया समूहों ने अपराधों को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया, लेकिन पिछड़ों की एम्पावरमेंट को इग्नोर किया।

सोशल मीडिया पर भी चर्चा होती है कि जंगल राज सवर्ण मीडिया की साजिश थी, क्योंकि लालू ने ओबीसी और दलितों को सशक्त किया। कुछ रिपोर्ट्स बताती हैं कि बाद की सरकारों में भी क्राइम है, लेकिन नैरेटिव कमजोर हो रहा।
मीडिया ने लालू को जोक्स का विषय बनाया, लेकिन उनकी सामाजिक न्याय की लड़ाई को छिपाया।


सामाजिक बदलाव पिछड़ों की जीत लालू के दौर में ओबीसी विधायकों की संख्या बढ़ी 1995 में 165 पिछड़े एमएलए बनाम 61 उच्च वर्ग। दलितों को इज्जत मिली, वे मजदूरी के लिए लड़ सके। मुसलमानों ने कांग्रेस छोड़ RJD को वोट दिया। लेकिन उच्च वर्गों ने प्रवास किया उस दौर में सम्पन्न सवर्णों ने बिहार के अलावा भी अन्य प्रदेशो में में अपना प्रवास बनाया उसी दौर में बिहार के समीप वाराणसी में ही हजारों बिहार के सवर्णों ने जमींन खरीदी , दिल्ली मुंबई आदि जगहों पर प्रवास किया इसके देखा देखी वंचित वर्ग भी रोजगार और शांति के उद्देश्य से महानगरों के तरफ पलायन किया, सम्पन्न सवर्णों ने बिहार को बदनाम किया। आज भी बिहारी शब्द को गाली की तरह इस्तेमाल किया जाता, लेकिन असली कारण जातीय असमानता है।

असली जंगल राज क्या है? जंगल राज कोई अराजकता नहीं थी, बल्कि सामाजिक न्याय की लड़ाई में उच्च वर्ग, आरएसएस की साजिश थी। लालू ने पिछड़ों को आवाज दी, लेकिन आरएसएस, मीडिया ने इसे बदनाम किया। असली जंगल राज तो सदियों की जातीय असमानता है, जो आज भी बिहार को जकड़े है। हमें इस नैरेटिव को तोड़ना होगा, ताकि सच्चाई सामने आए। बिहार का भविष्य सामाजिक न्याय में है, न कि आरएसएस, मनुवादी, सवर्णों के प्रोपेगैंडा में।

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